जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शेन्ज़ो आबे अब त्यागपत्र दे चुके हैं और उनकी जगह यूशीहीदे सोगा जापान के प्रधानमंत्री बन चुके हैं। शेन्ज़ोआबे को अधिक समय तक जापान का प्रधानमंत्री बने रहने का अवसर मिला है। अपने काल में उन्होंने एक एसी योजना पेश की जो अन्जाने में एक एसे गठबंधन की आधार बनी जिसे अब पूर्वी एशिया का नेटो कहा जा सकता है।
"क्वाड" कहे जाने वाले इस अनौपचारिक संगठन में अमरीका, भारत, आस्ट्रेलिया और जापान हैं और इनका इरादा है कि यह देश सैन्य, राजनीतिक और व्यापारिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा कर एसा संघ बनाएं जिसकी मदद से पूर्वी एशिया और प्रशातं महासागर में चीन के बढ़ते हुए प्रभाव पर अंकुश लगाया जाए।
चीन से डर के परिणाम में बनने वाले इस संघ का प्रस्ताव जापान के प्रधानमंत्री शेन्ज़ो आबे ने दिया था और सन 2007 में अनौपचारिक रूप से इस संघ ने काम करना आरंभ किया। क्वाड संघ ने तो तीन महाद्वीपों के इन चारों देशों की भागीदारी से प्रशांत महासागर में एक युद्धाभ्यास भी किया लेकिन जिस ठंडे ढंग से इस संघ का आरंभ हुआ था उसी तरह खामोशी से यह संघ आगे भी बढ़ा यहां तक कि सन 2008 में आस्ट्रेलिया इसमें से निकल गया। इस तरह से यह संघ शुरु होने से पहले ही खत्म होने लगा।
‘क्वाड’ को Quadrilateral Security Dialogue (QSD) के नाम से भी जाना जाता है। इस रणनीतिक वार्ता के साथ-साथ 2002 से मालाबार नामक संयुक्त सैन्य अभ्यास भी चल रहा है। मालाबार अभ्यास में अमेरिका, जापान और भारत शामिल हैं।
हो सकता है कि यह कहा जाए कि इन देशों को जिस चीज़ ने एक दूसरे से निकट किया है वह, मित्रता और हित नहीं बल्कि चीन से दुश्मनी है। दूसरी बात यह कि गठजोड़ के सदस्य कम हैं लेकिन उनमें ताल मेल नहीं है। जापान, भारत और आस्ट्रेलिया, दो अलग अलग महाद्वीपों से संबंध रखते हैं लेकिन फिर भी संबंधित और विवादित क्षेत्र तो हैं लेकिन अमरीका भी इन तीनों देशों से जुड़ गया है और यही इस गठजोड़ की कमज़ोरी है।
लेकिन इस बात पर भी ध्यान दिये जाने की ज़रूरत है इस गठबंधन की मज़बूती की वजह भी चीन से डर और उसके बढ़ते क़दम हैं। आज कल चीन दक्षिणी चीन सागर में भी आगे बढ़ रहा है, अमरीका के साथ टकरा भी रहा है और भारत से सीमावर्ती विवाद में भी व्यस्त है तथा आस्ट्रेलिया के साथ भी उसके राजनीतिक व आर्थिक विवाद में वृद्धि हुई है जिसकी वजह से चीन से आस्ट्रेलिया के लिए निर्यात असाधारण रूप से कम हो गया है। इस लिए यह सच्चाई है कि इस संघ और गठबंधन के गठन की वजह, दिन प्रतिदित मज़बूत होती जा रही है और जिस खतरे की वजह से इस गठबंधन का ख्याल पैदा हुआ था वह खतरा अब बढ़ रहा है।
इस लिए जो हालात हैं उनके मद्देनज़र इस बात की संभावना बहुत अधिक बढ़ गयी है कि इस संघ में फिर से जान पैदा हो जाए जैसा कि अनुमान भी लगाया जा रहा है। भारत हिन्द महासागर में होने वाले युद्धाभ्यास में आस्ट्रेलिया को निमंत्रण देने का इरादा रखता है। अमरीका के उप विदेश मंत्री ने भी महीने के आंरभ में अपने एक बयान में कहा था क्वाड अक्तूबर के अंत में दिल्ली में एक बैठक का आयोजन करके संयुक्त हितों पर चर्चा करने का इरादा रखता है। ज़ाहिर है" संयुक्त हित" का यहां सीधा सा अर्थ " संयुक्त दुश्मन " यानि चीन है।
अब सवाल यह है कि क्या किसी देश को इस संघ की ओर से चिंतित होना चाहिए ?
बहुत से विशेषज्ञों का कहना है कि यह संघ, नेटो संगठन की तरह है, लेकिन एटलांटिक महासागर नहीं बल्कि पूर्वी एशिया में और सोवियत संघ के डर से नहीं बल्कि चीन के डर से बना है। जिस तरह से नेटो ने राजनीतिक मंच का बुरी तरह से सैनिकीकरण कर दिया और अब सोवियत संघ नाम का कोई देश नक्शे में नहीं हैं उसी तरह से क्वाड भी आगे बढ़ सकता है लेकिन क्या वह भी किसी देश को इसी तरह से नक्शे से मिटा सकेगा? इस सवाल के जवाब के लिए अभी इंतेज़ार करना पड़ेगा।
क्वाड का आरंभ, सन 2008 में संयुक्त युद्धाभ्यास था और अब आस्ट्रेलिया फिर युद्धाभ्यास में भाग लेगा जिससे उसकी वापसी हो सकती है लेकिन सच्चाई यह है कि यह संघ और गठबंधन जितना आगे जाएगा उतना ही अमरीका की टीम में बदलता जाएगा और समान पोज़ीशन वाले सदस्यों के एक संघ के रूप में उसका बाकी रहना अधिक मुश्किल होता जाएगा जैसा कि नेटो का अंजाम हुआ है जो अब समान पोज़ीशन रखने वाले देशों के संगठन के बजाए अमरीकी वर्चस्व वाला एसा संगठन बन गया है जिसके सदस्यों को अमरीका के फैसलों और मनमानी की क़ीमत चुकानी पड़ती है। इस लिए अभी से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि क्वाड भी नेटो की तरह, अमरीकी योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करने का एक साधन बन जाएगा।
इस लिए सभी सदस्यों , खास तौर पर भारत को इस बात पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि चीन की दुश्मनी कहीं, अमरीकी साम्राज्य की गुलामी की वजह न बन जाए।